दर्पण
#सहभागिताशब्दालयप्रतियोगितालेखन
#विषय :- दर्पण (स्वयं से पहचान)
कभी कभी सोचो तो लगता है जीवन में क्या हो रहा है,
हम क्या कर रहे है और हमे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
इसके लिए हमें किसी चीज, वो चाहे इंसान हो या निर्जीव,
की जरूरत पड़ती है, वही आईना (दर्पण) होता है।
जो कभी कभी शीशे तो कभी कभी दोस्त या घर परिवार का कोई सदस्य होता है जो हमको दिखा जाता है।
ये समाज है जो हमारे किए हुए व्यवहार का एक परिणाम देता है जिसे हम दर्पण कह सकते हैं।
उसी शीशे के दर्पण के सामने
स्त्रियां अपने माथे की बिंदी को निहारती हैं
और पुरुष अपनी टाई और कोट को देख कर आगे बढ़ जाते हैं।
क्या कभी आपने खुद को दर्पण में खुद से बात किया है, नहीं न ,
तो आज जाकर खुद से बाते करो आईने के सामने
अपने आंखों में आंखे डालकर तो पता चलेगा कि तुम क्या हो
एक आत्मविश्वास जग जायेगा की हमने खुद से खुद को सिखाया है। ये आईना अपना है पराया नहीं । जो हमको जीना भी सिखाता है
जीने के तरीके बताता है गर शीशा पर धूल है तो चारो तरफ का संसार ही गंदा दिखेगा यदि शीशा स्वच्छ है तो पूरी दुनिया निराली लगेगी।( यहां चरित्र को अप्रत्यक्ष रूप से बताया गया है)
हमारे समाज का दर्पण विद्यालय और हमारा दर्पण हमारा आचरण,व्यवहार और हमारे द्वारा होने वाले हर कार्य ही हमारे लिए दर्पण है।
इसी के लिए मैं कुछ पंक्तियां लिखता हूं।
मानव: -
कि सही वक्त पर सही समझ आया क्यूं नहीं,
गर था मुझमें कोई खराबी तो तुमने बताया क्यूं नहीं।
लोग कहते हैं मैं बहुत बुरा हूं तो मुझे समझ आया क्यूं नहीं
गर था मुझमें कोई खराबी तो तुमने बताया क्यूं नहीं।।
मेरे चेहरे पर लगे थे कुछ धूल तुमने हटाया क्यूं नहीं
लोग हंसते रहे मुझ पर तुमने मुझे कुछ बताया क्यूं नहीं
दर्पण :-
मैं बोलता तो लोग खुद को आजमाते ही नहीं
मैं खुद हटा देता तुम्हारे दाग तुमको समझ आया क्यूं नहीं
मैं आईना हूं इस संसार में सिर्फ कांच का टुकड़ा ही नहीं
मैं हर स्वरूप में हूं तुमने मुझे देख पाया ही नहीं।
मैं रहता हु हर वक्त हर जगह बस तुम खुद को पाए ही नहीं
आ चल बाते कर मुझसे ।
क्यूं बोल नहीं पा रहे हो क्या
सच मुझसे तुम्हारा छुप पाया नहीं।
" वक्त की बात है समझ आता नहीं
जब रहता है तो कोई समझता ही नहीं
फिसल जाता है रेत की तरह
ये वक्त के कण में कोई एक नहीं
बीत जाने पर ही समझ आता है
ये 'दर्पण' है जो सब कुछ दिखलाता है
परंतु कुछ बताता नहीं , ये सब जान जाता है
हर किसी को आजमाता नहीं
खुद टूट जायेगा मगर गलत बताता नहीं।
एक दर्पण की कहानी है
जो किसी न किसी रूप में रहता है
स्वरचित सम्पूर्ण लेख
✍️Santo
#विषय :- दर्पण (स्वयं से पहचान)
कभी कभी सोचो तो लगता है जीवन में क्या हो रहा है,
हम क्या कर रहे है और हमे क्या करना चाहिए और क्या नहीं।
इसके लिए हमें किसी चीज, वो चाहे इंसान हो या निर्जीव,
की जरूरत पड़ती है, वही आईना (दर्पण) होता है।
जो कभी कभी शीशे तो कभी कभी दोस्त या घर परिवार का कोई सदस्य होता है जो हमको दिखा जाता है।
ये समाज है जो हमारे किए हुए व्यवहार का एक परिणाम देता है जिसे हम दर्पण कह सकते हैं।
उसी शीशे के दर्पण के सामने
स्त्रियां अपने माथे की बिंदी को निहारती हैं
और पुरुष अपनी टाई और कोट को देख कर आगे बढ़ जाते हैं।
क्या कभी आपने खुद को दर्पण में खुद से बात किया है, नहीं न ,
तो आज जाकर खुद से बाते करो आईने के सामने
अपने आंखों में आंखे डालकर तो पता चलेगा कि तुम क्या हो
एक आत्मविश्वास जग जायेगा की हमने खुद से खुद को सिखाया है। ये आईना अपना है पराया नहीं । जो हमको जीना भी सिखाता है
जीने के तरीके बताता है गर शीशा पर धूल है तो चारो तरफ का संसार ही गंदा दिखेगा यदि शीशा स्वच्छ है तो पूरी दुनिया निराली लगेगी।( यहां चरित्र को अप्रत्यक्ष रूप से बताया गया है)
हमारे समाज का दर्पण विद्यालय और हमारा दर्पण हमारा आचरण,व्यवहार और हमारे द्वारा होने वाले हर कार्य ही हमारे लिए दर्पण है।
इसी के लिए मैं कुछ पंक्तियां लिखता हूं।
मानव: -
कि सही वक्त पर सही समझ आया क्यूं नहीं,
गर था मुझमें कोई खराबी तो तुमने बताया क्यूं नहीं।
लोग कहते हैं मैं बहुत बुरा हूं तो मुझे समझ आया क्यूं नहीं
गर था मुझमें कोई खराबी तो तुमने बताया क्यूं नहीं।।
मेरे चेहरे पर लगे थे कुछ धूल तुमने हटाया क्यूं नहीं
लोग हंसते रहे मुझ पर तुमने मुझे कुछ बताया क्यूं नहीं
दर्पण :-
मैं बोलता तो लोग खुद को आजमाते ही नहीं
मैं खुद हटा देता तुम्हारे दाग तुमको समझ आया क्यूं नहीं
मैं आईना हूं इस संसार में सिर्फ कांच का टुकड़ा ही नहीं
मैं हर स्वरूप में हूं तुमने मुझे देख पाया ही नहीं।
मैं रहता हु हर वक्त हर जगह बस तुम खुद को पाए ही नहीं
आ चल बाते कर मुझसे ।
क्यूं बोल नहीं पा रहे हो क्या
सच मुझसे तुम्हारा छुप पाया नहीं।
" वक्त की बात है समझ आता नहीं
जब रहता है तो कोई समझता ही नहीं
फिसल जाता है रेत की तरह
ये वक्त के कण में कोई एक नहीं
बीत जाने पर ही समझ आता है
ये 'दर्पण' है जो सब कुछ दिखलाता है
परंतु कुछ बताता नहीं , ये सब जान जाता है
हर किसी को आजमाता नहीं
खुद टूट जायेगा मगर गलत बताता नहीं।
एक दर्पण की कहानी है
जो किसी न किसी रूप में रहता है
स्वरचित सम्पूर्ण लेख
✍️Santo
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