मैं दर्द के दरिया में इस कदर बहता रहा ,

कि किनारे लगकर भी दर्द सहता रहा ।

बेजुबान की दर दर भटकता रहा,

दूसरों से रो रो कर खुद का पता पूछता रहा।।

हो गया इतना बेजान की दुनिया पराई और 

खुद को अपना समझता रहा ।


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