बस थोड़ा भटक गया हु अपनी मंजिल की रास्ते से

न जाने किधर जा रहा हूं रास्ता नया तो नहीं है

कुछ जानी पहचानी सी लग रही है

लगता है कभी इधर आया हूं मैं

लेकिन बहुत ठोकरें खाया हूं इसी रास्ते पर

फिर न जाने कैसे आ गया इस पर

लगता है फिर मेरा वक्त बर्बाद होगा

वो किसी और के साथ आबाद होगा 

आते जाते हुए लोग बहुत है 

फिर से मेरे पास सलाहो का जखीरा होगा

इतना बड़ा मर्ज नही था लेकिन 

कुछ ने बना दिया है भटकने की राह इसे

क्या कहूं कोई मानता ही नहीं

मैं ही गुनहगार नहीं हूं

कोई और भी इसमें शामिल है

सजा उसको भी मिलनी चाहिए

मुझे ही क्यों मिल रही है

कत्ल दोनो ने किया है 

बस वो बच के निकल गया मुझे छोड़कर

मैं अब भी फसा हू इसी कत्ल में 

कोई बचाने क्यों आता नहीं  

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