संदेश

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you can deserve better than me 🖤 कि तुम मुझे देख मुस्कुराती , मैं तुम्हे देख मुस्कुराता , तुम थोड़ा सा शर्माती, मैं इशारों में पास आता तुम नखरे दिखाती और मैं पीछे मुड़ जाता तेरी तिरछी नैनो में मैं खुद को पाता फिर मैं वहीं पिघल जाता  जो आता मैं तुमसे दोस्ती के वास्ते  तु मुश्किलें हजार गिनाता मैं वापस चला जाता  यदि मैं करता इज़हार ऐ इश्क का -2 तुम ठुकरा देती और मैं वहीं बिखर जाता। सारे सपने जो सोचे थे मैने कुछ पल में वो सारे वहीं खतम हो जाते  गर मैं करता इज़हार ऐ मोहब्बत का  तुम ठुकरा देती और मैं वहीं बिखर जाता । चलो मान लिया कि तुम नहीं जानते हमको क्या मैं अपने बारे में नहीं बताता तुमको  क्या मैं पूछता नहीं कभी तुमको ? अरे तुम अपना हाल क्या सुनाओगी मुझे ही रोना आएगा जब तुम  you can deserve better than me  बोलके मेरे मुंह पर चली जाओगी  गर मैं करता इज़हार ऐ इश्क का -2 तुम ठुकरा देती और मैं वहीं बिखर जाता। -Santo 
कोई रातों को जगता है दिन को जीने के लिए कोई दिन में थकता है जिंदगी जीने के लिए कोई पीता है किसी को याद आने के लिए कोई पीता है किसी को याद न आने के लिए सुबह से शाम हो जाती है कहीं तक जाने के लिए राते भी सो गई है मेरे बिन , लोग खो जाते हैं रोने के बाद सड़के भी सुनसान सी हो गई हैं कल का सूरज भी निकलने को है जग सारा रुका हुआ लग रहा है मैं क्यूं नहीं रुक पाता हां मैं शराब क्यूं नहीं पी पाता, लगता है खोने से डरता हूं मैं और एक तुम हो मेरा ख्याल न रहा तुमको  तुमने पलक झुका कर हमको बेजुबान कर गए  हम तेरे एहतराम में रह गए तुम किसी और के शाम में बस गए हमारी जिंदगी सुनी करके किसी और की नजर बन गए मैं खुद ही टूट रहा हूं मैं खुद से रूठ रहा हूं खुद को ही अंदर ही अंदर जला रहा हूं कल को खुद ही बदल जाऊंगा बस आज ही थोड़ा बिगड़ गया हूं  आज की शाम नहीं जी रहा हूं कल का सुबह जीने की कोशिश करेंगे अब हद से ज्यादा न बिगड़ेंगे, कर रहा हूं शिकायतें खुद से  कुछ नया बुनने में लगा हूं मैं अपने आप में खुद एक सूरज हूं। अंधेरों से खुद ही लड़ा हूं मैं अपने आप में खुद एक सूरज हूं।। -Santo 
 शिकायतों का जखीरा लेकर आए थे वो हमसे मिलने। मिलने के बाद कुछ यादें समेटकर ले गए वो हमसे ।। - Santo
 शायर कहकर बदनाम ना कर, मैं तो रोज़ शाम को दिनभर का ‘हिसाब’ लिखता हूँ !🙂🙂🙂
मैं हर रोज वही भूल करता हूं मैं हर रोज वहीं फूल फेंकता हूं। चुभ जाते हैं जिनके कांटे उंगलियों में आज भी उन्ही फूलों को सींचता हूं।। -Santo 
बस थोड़ा भटक गया हु अपनी मंजिल की रास्ते से न जाने किधर जा रहा हूं रास्ता नया तो नहीं है कुछ जानी पहचानी सी लग रही है लगता है कभी इधर आया हूं मैं लेकिन बहुत ठोकरें खाया हूं इसी रास्ते पर फिर न जाने कैसे आ गया इस पर लगता है फिर मेरा वक्त बर्बाद होगा वो किसी और के साथ आबाद होगा  आते जाते हुए लोग बहुत है  फिर से मेरे पास सलाहो का जखीरा होगा इतना बड़ा मर्ज नही था लेकिन  कुछ ने बना दिया है भटकने की राह इसे क्या कहूं कोई मानता ही नहीं मैं ही गुनहगार नहीं हूं कोई और भी इसमें शामिल है सजा उसको भी मिलनी चाहिए मुझे ही क्यों मिल रही है कत्ल दोनो ने किया है  बस वो बच के निकल गया मुझे छोड़कर मैं अब भी फसा हू इसी कत्ल में  कोई बचाने क्यों आता नहीं  
 वो कहते थे कि  तुम बहुत याद आओगे मैने भी कह दिया था कि हम भी याद करेंगे तुमको पर हमको क्या पता था  की वो इसी lockdown  me Sunday ki तरह  हमको भी भूल जायेंगे हमने भी संदेशा भेजा  की हमने कहा था न हम तुमको बहुत मिस करेंगे  लेकिन तुम तो अपनी बातो से भी मुकर गए  और हम कहते रह गए  कि तुम बहुत याद आओगे। कि तुम बहुत याद आओगे।। 😓 ✍️Santo 07June2021 at 4:06 am
मन तो बहुत कर रहा है चीखने चिल्लाने का  लेकिन कर भी क्या सकता हु ये अपना शहर प्रयागराज  बुलाता बड़ी खुशी से है बस छुटने पर रुलाता बहुत है कुछ घर की यादें भी  उसी में अपनापन लेकर आता है बस आंख को नम करके चला  जाता है   

LOVE WITH TEA❣️

Love with Tea 3 उसने कहा था कि  कभी साथ बैठकर  चाय पियेंगे । हम आज भी उसका इंतजार  करते हैं कि क्या पता  कभी मैसेज कर के  कह दे की आज की शाम  तुम और सांवली चाय तेरे साथ में।❤️ 
Love U with Tea मैं तेरे हर झूठ को  सच मान बैठा हूं। जब से तुमने  चाय की एक  घूंट साथ पी रखा है।। चाय का पेमेंट  अक्सर तो मैं ही कर देता हूं लेकिन तुम भी कभी  कर देना इसकी कीमत अदा मत करना मुझे  इस तरह इग्नोर की मैं हर चुस्की को घुटन सा समझूं।  
Love With Tea 2 कि तुम उस चाय की  टपरी pr जाया करो  जहां मैं जाया करता हूं। क्या पता की उस चाय की तरह मेरी मेरी सांवली सूरत भी  तुमको पसंद आ जाए।
जब हमको नींद नहीं आती है तो ये राते भी बड़ी हो जाती हैं काटने से भी नहीं कटती  क्या कहूं ये रात वही है जो किसी के लिए नए  सबेरे का सूरज लेके आती है  और किसी का सूरज डूबा के  चली जाती है। जरा सा आंखे बन्द करके सोने की कोशिश करो  तो अंधेरे में बस घड़ी की टिक टिक  की आवाज आती है  कैसे बयां करूं मैं इस  भयावह काली रात को  की मुझे ही मेरी धड़कन  की आवाज सुनाई जाती है कि मैं कैसे बयां करूं  इस भयावह काली रात को कि मुझे ही मेरी धड़कन  की आवाज सुनाई दे जाती है। बदलते रहते हैं हम सिर्फ करवट फिर ये नींद नहीं आती है मैं कैसे बयां करूं इसको कि ये मुझे ही मेरी धड़कने सुना जाती है। लोग कहते हैं कि  पूर्णिमा की रात बड़ी अच्छी होती है और अमावस्या की बड़ी खराब  अरे उनसे पूछो ना कि जिसका कोई  प्रिय पूर्णिमा को छोड़ जाता है  और अमावस्या पर किसी  के घर का नया चिराग आता है। ये रात बड़ी लंबी होती है बड़ी हसीन और बड़ी गमगीन होती है जब हमको नींद नहीं आती है तो ये रातें भी बड़ी हो जाती हैं कि कैसे बयां करूं मैं इस भयावह काली रा...
 चंद लाइनें हमारी दोस्ती को बयां नहीं कर सकती। कुछ झगड़े हमको अलग  भी नहीं कर सकते। मुझे मालूम है कि मेरी जिन्दगी में तुम्हारी क्या अहमियत है। मैं अपनी तरफ से दोस्ती की डोर को मजबूती से बांधा हूं। कोई भी कड़ी कमजोर नहीं है। वक्त चाहे जैसा भी हो तुमने साथ दिया है । किस्से तो बहुत है जादा गाने की जरूरत नहीं है। लेकिन कुछ भी कैसा भी वक्त हो  पहला कॉल तुम्ही को जाता है  आज भी मेरी contact dial में सबसे ज़्यादा तुम्हारा ही नाम आता है। मुझे आज भी याद है कि पूरे क्लास में सबसे पहले तुम्हारे ही साथ Intex ki मोबाइल फोटो खींचे थे। और फोटो के शौकीन तुम भी हो और हम भी इससे ज्यादा और क्या बताऊं। लेकिन कुछ भी हो गुरु सबसे पहले तुमको ही याद करते हैं। ❤️❤️ हैप्पी बर्थडे दोस्त  @सचिन ❣️🎂🎂
गर कोई खूबी हैं तुममें  तो उसको बताना जरूरी है। अगर अपना मालिक बनकर रहना है तुमको  तो लोगो को बताना जरूरी है। लोग होते ही है चूतिया उनको उनकी औकात  एक बार दिखानी जरूरी होती है।। बाकी तुम तो हमेशा सदा बहार वन हो ❤️❤️❤️ 
सब दोष देते हैं इस निर्जीव से फोन को कोई अपने को दोष नही देता  कभी सोचा क्यों नही की  इसको ऑफ भी तो कर सकते हैं कोई रोका तो नहीं अपने मतलब से है ये दुनिया कभी खाली बैठे फोन चलाते है कभी डिस्टर्ब होकर फोन चलाते हैं कभी सफर में फोन चलाते हैं बस अपना टाइम काट जाते हैं फिर भी दोष देते हैं कि  ये फोन हमको बर्बाद करते जाते हैं  
टुकड़े टूट कर फिर से टुकड़े हो गए जिगर के टुकड़े थे जो टूट कर वो  दूसरों के जिगर के टुकड़े हो गए पहले हम टूटे थे फिर जुड़े थे अब फिर से टूटकर मेरे जिगर के टुकड़े हो गए।।😢 -Santo 

मां

  कि कर लूं इतनी कमाई  तेरे आंगन में सजा दूं  चांद तारों की दुनियां तू कहे तो पानी ला दूं तू कहे तो पेड़ लगा दूं रेत की दुनियां में  मरीचिका सा खूबसूरत महल बना दूं पूरी दुनियां को  एक ओर करके  तेरी अलग दुनियां बना दूं  बोल न मां आज चुप क्यों है तेरे लाडले ने ये बातें कही तू कहे तो सच करके दिखा दूं आज मैं तेरे आंचल के छांव में  सोना चाहता हूं खुद ही रोना चाहता हूं लाख कमाने के बाद भी  तेरी आंचल न नसीब हो तो  बोल न मां क्या पूरी दुनियां जला दूं तेरे चरणों में मैं अपनी दुनियां बसा लूं Santo

अकेलापन

मैं बस चुप चाप चला जा रहा  लोगो की भीड़ में अकेला होता जा रहा साथ बहुत लोग चल रहे हैं पर मुझे अकेलापन घेरे जा रहा  मैं सांस ले रहा हु फिर सांसे रुकी सी जा रहीं मुझे अंदर ही अंदर खूब रोना आ रहा और मैं बाहर से ही शांत होता जा रहा  मैं खुद को जोकर सा हंसा रहा  मेरी धड़कने रुकने सी हैं और सब खुश हैं अपनी जिंदगी में बस मुझे छोड़कर  मेरा दिल अंदर ही अंदर बैठा जा रहा और सामने वाले को बस मजा आ रहा डर है मुझे की कहीं ये सांसे टूट न जाएं बहुत कुछ करना था इस छोटी सी उम्र में पत्थर को पानी से तोड़कर, एक नया रास्ता बना रहा बहुत ही जल्दी रूबरू हो जाता हूं सच्चाई से पर क्या करूं खुद रोऊं तो गैर सा लगा जा रहा कुछ है जो अपना सा फिर भी दूर जा रहा बड़ी उलझने बढ़ गई इस छोटी सी जिंदगी में बस अगले की पल लगता की मुझसे अब चला न जा रहा थक गया हूं इस कदर कि अब रुका भी न जा रहा  कुछ हो न जाए खराब इस मोड़ पर  अब जिंदगी भी मुझसे दूर जा रहा।। -santo 
 मैं दर्द के दरिया में इस कदर बहता रहा , कि किनारे लगकर भी दर्द सहता रहा । बेजुबान की दर दर भटकता रहा, दूसरों से रो रो कर खुद का पता पूछता रहा।। हो गया इतना बेजान की दुनिया पराई और  खुद को अपना समझता रहा ।
style="text-align: left;"> मन तो बहुत कर रहा है चीखने चिल्लाने का  लेकिन कर भी क्या सकता हु ये अपना शहर प्रयागराज  बुलाता बड़ी खुशी से है बस छुटने पर रुलाता बहुत है कुछ घर की यादें भी  उसी में अपनापन लेकर आता है बस आंख को नम करके चला  जाता है   
 तुम हमारी सराफत पूछते हो, वो भी हमीं से । लगता है इस शहर के नए किरायेदार हो तुम।। ❣️ ✍️Santo

दर्पण

#सहभागिताशब्दालयप्रतियोगितालेखन #विषय :- दर्पण (स्वयं से पहचान) कभी कभी सोचो तो लगता है जीवन में क्या हो रहा है, हम क्या कर रहे है और हमे क्या करना चाहिए और क्या नहीं। इसके लिए हमें किसी चीज, वो चाहे इंसान हो या निर्जीव,  की जरूरत पड़ती है, वही आईना (दर्पण) होता है। जो कभी कभी शीशे तो कभी कभी दोस्त या घर परिवार का कोई सदस्य होता है जो हमको दिखा जाता है। ये समाज है जो हमारे किए हुए व्यवहार का एक परिणाम देता है जिसे हम दर्पण कह सकते हैं। उसी शीशे के दर्पण के सामने स्त्रियां अपने माथे की बिंदी को निहारती हैं और पुरुष अपनी टाई और कोट को देख कर आगे बढ़ जाते हैं। क्या कभी आपने खुद को दर्पण में खुद से बात किया है, नहीं न , तो आज जाकर खुद से बाते करो आईने के सामने  अपने आंखों में आंखे डालकर तो पता चलेगा कि तुम क्या हो  एक आत्मविश्वास जग जायेगा की हमने खुद से खुद को सिखाया है। ये आईना अपना है पराया नहीं । जो हमको जीना भी सिखाता है  जीने के तरीके बताता है गर शीशा पर धूल है तो चारो तरफ का संसार ही गंदा दिखेगा यदि शीशा स्वच्छ है तो पूरी दुनिया निराली लगेगी।( यहां चरित्र क...